संविधान के 70 साल : जनता को कर्तव्य याद रहे लेकिन जनप्रतिनिधि भूल गए
देश के संविधान निर्माताओं ने संविधान का मसौदा तैयार किया था तब उज्जवल भारत के निर्माण के लिए उन लोगों ने बेहतर समाज, व्यवस्था और लोकतंत्र का सपना देखा था। संविधान का मसौदा स्वीकार करने और संविधान दिवस के करीब सात दशक बीतेने के बाद खासतौर पर लोकतंत्र उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा और न हम बेहतर भारत के निर्माण के लिए बेहतर समाज तैयार कर पाए।
जहां तक लोकतंत्र का सवाल है तो ताजा उदाहरण महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद जारी सियासी उठापटक है। सूबे में लोकतंत्र के नाम पर अजीबोगरीब खेल खेला जा रहा है। चुनाव के नतीजे आए एक महीने से ज्यादा समय गुजर चुका है, मगर राज्य में स्थायी सरकार का स्वरूप तक तय नहीं है। वह भी तब जब ऐसी स्थिति से बचने के लिए संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 बना कर जनप्रतिनिधियों की योग्यता, अयोग्यता, भ्रष्टाचार, चुनाव के संबंध में कई अहम प्रावधान किए थे। इसके बाद भी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर इस कानून में कई बार संशोधन किया गया।
झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश कहते हैं महाराष्ट्र में सरकार गठन पर जारी सियासी उठापटक और इससे पहले भी हुई इस तरह की सियासी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जनप्रतिनिधियों और लोकतंत्र में इस दौरान कितना पतन हुआ अब यह कोई ढकी छिपी बात नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो हमारा लोकतंत्र संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुरूप बेहतर परिणाम नहीं दे पाया। उल्टे हमारा यह क्षेत्र भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अपराध के दलदल में फंसता चला गया।
जहां तक महाराष्ट्र, केंद्र या दूसरे राज्यों में सियासी उठापटक की बात है तो अब सियासत में सत्ता महत्वपूर्ण है, इसे हासिल करने के लिए माध्यम बीते कुछ दशकों से महत्वहीन हो गया है। दुख की बात यह है कि लोकतंत्र, जनप्रतिनिधि ही नहीं देश में समाज के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर नए भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाने का माद्दा रखने वाले सभी क्षेत्रों का तेजी से पतन हुआ है।
मेरा मानना है कि देश के जनप्रतिनिधि तो देश को सही दिशा नहीं ही दे पाए, हमने भी अपनी प्राथमिकताएं बदल ली। जनप्रतिनिधि और लोकतंत्र लोगों की अपेक्षा पूरा करने केलिए विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षा के अनुरूप आधारभूत संरचना खड़ा नहीं कर पाया। इस बीच समाज का भी नैतिक पतन हो गया। भारतीय राजनीति की धुरी कुछ चुनिंदा परिवारों तक सीमित हो गई और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता सूची में देश और समाज सबसे पीछे के पायदान पर चला गया।
जनप्रतिनिधत्व कानून में घालमेल का ताजा उदाहरण महाराष्ट्र है। राज्य में जिन दो दलों ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर बहुमत हासिल किया वे साथ सरकार बनाने केलिए तैयार नहीं हैं। इसके उलट अलग-अलग लड़े तीन दलों की बेमेल गठबंधन सरकार की कोशिशें भी परवान नहीं चढ़ पाई। इसी बीच राज्यपाल ने अचानक एक बिल्कुल नए गठबंधन की सरकार को शपथ दिला दी। हालत यह है कि अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि जिसे शपथ दिलाई गई, जिसने सरकार बनाई उसे विधानसभा में बहुमत हासिल है भी या नहीं। दूसरी ओर यह भी अभी रहस्य ही है कि जो तीन दल सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं, उनके सभी विधायक उनके साथ हैं भी या नहीं।
इस स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन कहती हैं संविधान दिवस पर देश में लोकतंत्र और जनप्रतिनिधयों की स्थिति देश के भविष्य के लिए एक सिहरन पैदा कर रही है। समस्या यह है कि हमें संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार तो पता हैं, मगर हम इसी के साथ मौलिक कर्तव्य को भूल गए हैं। हम यह भूल जाते हैं कि संविधान में हमें अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य निभाने की भी बात साथ-साथ कही है। वर्तमान में बेहतर लोकतंत्र के लिए जरूरी मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य के बीच का मजबूत संतुलन खत्म होता जा रहा है।
राजनीति की बात करें तो वर्तमान में महाराष्ट्र का ही सियासी ड्रामा देखें। जनता ने वोट देकर मौलिक कर्तव्य तो निभा दिया है, मगर क्या सियासी दल नैतिक तरीके से सरकार गठन कर सेवा करने का कर्तव्य निभा रहे हैं? क्या महाराष्ट्र भारतीय राजनीति में इकलौता उदाहरण है? नहीं, बीते तीन से चार दशकों में जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों में सत्ता हासिल करने की ललक इतनी ज्यादा बढ़ी है कि इसमें नैतिकता अब बीती बात हो कर रह गई है। हमें यह याद रखना होगा कि जिस तरह सिर्फ बहती हुई नहीं ही जिंदा रहती है, उसी तरह लोकतंत्र अधिकार और कर्तव्य के बीच बेहतर संतुलन से ही जिंदा रह सकता है।

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