क्यूँ मनाया जाता हैं धनतेरस, जानिए सम्पूर्ण पूजन विधि और शुभ धनतेरस मुहूर्त

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन, समुंद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसी कारण इस दिन को धनतेरस के नाम से जाना जाता है

dhanteras 2020 muhurat




भारत सरकार द्वारा धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाने का निर्णय लिया गया है


धनतेरस से जुड़ी एक प्रचलित कथा है कि, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की एक आँख फोड़ दी थी|


भगवन विष्णु ने राजा बलि के भय से देवताओं को मुक्त कराने के लिए वामन अवतार लिया और राजा के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए|

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शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु को वामन अवतार में भी आसानी से पहचान लिया 


और राजा से आग्रह किया कि, वामन कुछ भी मांगे तो साफ़ इंकार कर देना|


उन्होंने राजा को बताया कि वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं, जो देवताओं की 

सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आये हैं|


शुक्राचार्य के बताने के बाद भी बलि ने उनकी बात नहीं मानी| वामन भगवान  द्वारा मांगी गयी तीन पग भूमि, दान करने के लिए राजा कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे|


बलि को दान से रोकने के लिए शुक्राचार्य ने  कमंडल में लघु रूप धारण करके प्रवेश किया, जिसके कारण कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया|


भगवान विष्णु शुक्राचार्य की इस चाल को समझ गए, जिसके बाद उन्होंने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमंडल में ऐसे रखा की शुक्राचार्य की एक आँख फूट गयी


जिसके बाद शुक्राचार्य छटपटाकर कमंडल से बाहर निकल आये| इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया|


तब भगवान विष्णु ने अपने एक पैर से पूरी पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे से संपूर्ण अंतरिक्ष को| तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो, बलि ने अपना सर विष्णु भगवान  के चरणों में रख दिया|


बलि ने दान में अपना सब कुछ गवां दिया| इसी प्रकार बलि के भय से सभी देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन संपत्ति देवताओं से छीन ली थी, उससे कई गुना ज़्यादा संपत्ति देवताओं को वापिस मिल गयी थी|


धनतेरस का त्यौहार मनाने का ये भी एक बहुत बड़ा कारण है| 


इस दिन भगवान धन्वंतरि के साथ-साथ माँ लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है, क्योंकि मान्यता है की भगवान धन्वंतरि का जन्म समुन्द्र मंथन के दौरान हुआ था, फिर उनके दो दिन बाद ही माँ लक्ष्मी भी प्रकट हुई थी|


दीपावली से पहले धनतेरस पूजा का  विशेष महत्व माना जाता है| धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन और झाड़ू की खरीदारी करना शुभ माना जाता है


वहीं इस दिन लोहे के सामान की खरीदारी नहीं करनी चाहिएमाना जाता है की इस दिन लोहे की खरीद करने से परिवार पर राहु की अशुभ छाया पड़ने लगती है|


इसके अलावा इस दिन लोहा खरीदने से लोगो की परेशानी भी बढ़ती है| इस दिन शीशे के सामान को भी नहीं खरीदना चाहिए, क्योंकि मान्यता है की शीशे का सम्बन्ध भी राहु से ही होता है|


शीशे का सामान खरीदने पर राहु की दृष्टि हमेशा बानी रहती है, जिसके चलते लोग परेशान रहते हैं|


आमतौर पर लोग धनतेरस के दिन खरीदारी करने के नाम पर स्टील के बर्तन खरीद लेते हैं, जो की नहीं खरीदने चाहिए|


कहा जाता है की स्टील भी लोहे का बदला हुआ दूसरा रूप है, इसलिए स्टील के बर्तन खरीदने से राहु की छाया  पूरे साल तक पड़ती रहेगी|


स्टील की बजाए ताम्बे या कांसे  के बर्तन की खरीदारी की जा सकती है| इस दिन काले कपड़े की खरीदारी भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धनतेरस प्रगति और सौभाग्यदायी दिन है, जबकि कला रंग दुर्भाग्य का प्रतीक माना जाता है| 


dhanteras pooja vidhi

इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से माँ लक्ष्मी की कृपा हमेशा बानी रहती है


पूजा के समय निम्न सामग्री का प्रयोग किया जाता है - 21 कमल के बीज, मणि पत्थर के पांच प्रकार, पांच सुपारी


लक्ष्मी-गणेश के सिक्के, पत्र, अगरबत्ती, चूड़ी, तुलसी, पान, सिक्के, काजल


चन्दन, लौंग, नारियल, दाहिशरीफा, धुप, फूल, चावल, रोली, गंगाजल, माला, हल्दी, शहद, कपूर, आदि|


इस दिन संध्या के समय उत्तर दिशा में कुबेर, धन्वंतरि भगवान और माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है


पूजा के समय घी का दीपक जलाया जाता है, जिसके बाद कुबेर भगवान के आगे सफ़ेद मिठाई वहीं धन्वंतरि भगवन को पिली मिठाई अर्पित की जाती है|

 

धन्वंतरि पूजा के बाद भगवन गणेश और लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है| उनके आगे भी मिटटी के दीपक जलाये जाते हैं और मिठाई अर्पित की जाती है|


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